“आपकी जाति क्या है?”

रिया का बेटा सुबह ही जिद्द कर रहा था कि पार्क में जाकर खेलना है । रिया ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की कि अभी घर में ही खेलते है शाम को पार्क चलेंगे। पर उसने जिद नहीं छोड़ी। आखिर में रिया को अपने बेटे के साथ पार्क में जाना ही पड़ा। वहां पर एक छोटी बच्ची , उसकी आयु २ साल की होगी अपनी बहन के साथ खेल रही थी। बहन की आयु १० १२ साल की होगी।
रिया का बेटा भी उनके साथ जाकर खेलने लगा। कभी झूलों पर तो कभी अपनी बॉल के साथ। थोड़ी देर खेलने के बाद उस बच्ची की बहन रिया के पास आकर पूछती है कि आप किस जाति के हो?
रिया एकदम से यह प्रश्न एक १० १२ साल की बच्ची के मुंह से सुन कर आश्चर्यचित रह जाती है। उस बच्ची ने ना कोई नाम पूछा ना कुछ सीधे ही ऐसा सवाल।
फिर रिया ने उससे पूछा कि आप तो बच्चे हो आप उसका नाम पूछो आपको जाति जान कर क्या करना है?
उसने बोला नहीं में तो ऐसे ही पूछ रही थी। इतना कहने के बाद वह अपनी बहन को लेकर वहां से चली गई।अभी रिया का बेटा और उसकी बहन आपस में खेल रहे थे।
रिया इस घटना से बहुत हैरान हुई। वह सोचने लगी कि यह बच्चे ऐसा क्या देखते सुनते है जो इस उम्र में भी इनको जात पात का पता है। खेलने के लिए भी कोई जाति पूछ कर खेलता है क्या?
हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? क्यों हम जात पात को इतना महत्व देते है? क्या इसके बिना एक आदमी कि पहचान पूरी नहीं हो सकती?
जब आरक्षण की बात भी आती है तो क्यों वो भी इस कास्ट सिस्टम तक ही सीमित हो कर रह जाती है? अगर यह किसी के फायदे के लिए है तो उनको मिले जिन्हें जरूरी है , जो दिन भर मेहनत करते है ताकि रोटी मिल जाए , पर अपने बच्चो को पढ़ा नहीं पाते। २१वी सदी में आ कर जहां सब कुछ डिजिटल, कंप्यूटराइज्ड हो रहा है क्यों हम इस छोटी सी बात में आगे नहीं बढ़ पाते।
कब हम इन छोटी छोटी बातों से उपर उठ कर बड़ा सोचेंगे? आखिर कहां कमी रह जाती है कि हमारे बच्चे भी इन बातों से अछूते नहीं है?