#तीज़ # पति की याद

उसने दरवाजे से  बाहर देखा, और उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसका वीरा आया था । सावन का महीना शुरू हो चुका था। तीज़ का त्योहार आ रहा था। उसकी शादी को केवल दो महीने ही हुए थे। शादी के बाद पहले तीज़ उत्सव का अपना ही चाव होता है। वह तुरंत अपनी सासू मां को बताने के लिए अंदर गई। उसने पहले से ही अपनी तैयारी कर रखी थी। अपनी सासू जी व ससुर जी  के आशीर्वाद के साथ, वीरा को चाय और पानी देने के बाद, वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने मायके चली गई।                       

 उसकी सहेलियां भी वहां थी। बस फिर क्या था  तीज़ के दिन सभी ने सुंदर कपड़े पहने, पैरों में पाजेबे डाली, सोलह सिंगार किया, सांझी जगह पर इकट्ठी हो गई।   

   सभी शादीशुदा सहेलियां अपने ससुराल और अपने पति के बारे में बात करने लगे। कुछ को सास मां जैसी  मिली थी और किसी के  ससुर पापा जैसे  थे। फिर बात पति पर आयी। कुछ बोली  कि मेरे पति को यह पसंद है और कुछ बोली  उन्हें वो पसंद है। लेकिन जब  पति की बात आई  तो  वह चुप कर गई ?                        सभी सहेलियां उससे पूछने लगी कि क्या हुआ? सब ठीक है, ना? उसने कहा, “मेरी सास बहुत अच्छी हैं। मेरा देवर  भी मुझे अपनी माँ की तरह मानता हैं। लेकिन मैं उस घर में जिसके  कारण से गई हूं उसके  बारे में कुछ भी  नहीं जानती।” सभी सहेलियां आश्चर्यचकित थी। वे सभी एक साथ बोली, “ओह कैसे? तुम एक दूसरे से बात नहीं करते? वह तुम्हारे साथ नहीं रहता?” कई सवाल उसे घेरने लगे।               फिर उसने कहा, “मेरे पति सेना में है। हमारी शादी के अगले दिन, उन्हें ड्यूटी पर बुलाया गया था और उन्हें जाना पड़ा। तब से हमारी बात बस चिठियों से ही हुई है। और मुझे बस यही पता है कि उन्हें उनकी माँ के हाथों के आलू के परांठे बहुत पसंद है फिल्में देखना बहुत पसंद है।” मुझे पता है कि तीज़ कहीं न कहीं पति की सुरक्षा के लिए मनाई जाती है। यह हार शिंगर  उनके लिए ही तो है। मैने तो आज का  उपवास भी रखा है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है  कि जैसे मेरे पति दिन-रात अपने देश की रक्षा कर रहे हैं, वैसे ही भगवान उनकी रक्षा करें। और मैं अपना कर्तव्य पूरा करते हुए, उनके माता-पिता का ध्यान रखूं। ”                      यह कहते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसकी सहेलियां  उससे चिपक गई। 

Dream come true

“Papa, one day I will fly this.” Pointing to the sky, twelve-year-old Monica said. Her father followed gesture of her hand where an airplane was drawing the line of clouds in the sky. Her father smiled and said “Okay.” Her dream had wings that day as her father had shown his faith in the same .                     Monica was a small town girl. She was from the middle class family and had never gone outside her city alone. At that point of time, she didn’t even know, how to drive a car? She just did a small accident with her Activa.  In the narrated circumstances, her dream to fly looked like nothing more than a wishful thinking.                     With the passage of time, as she grew older, her dream seem to have completely vanished as she got an admission in an enginnering college and started pursuing the same. But her father’s believe and faith was still alive who surprised her by asking, “is she ready to fly?”                                        Thereafter, she saw major turns in her life. For the first time in her life, she was going, not out of her city but abroad alone to fulfill her dream. She was nervous but equally excited to take her first step towards her dream which was earlier looked like a ‘Wishful Thinking’. She started walking alone and after that, she never looked back.                      A middle-class family girl from a small town saw the dream at the age of twelve and acheived it at the age of twenty two, simply because of her parents blessings and most importantly, her father’s unshaken belive in her dream.

सपना पूरा हुआ ।

“पापा, एक दिन मैं भी यह उड़ाऊँगी।” आसमान की ओर इशारा करते हुए आठ साल की मोनिका ने बोला। उसके पापा ने उसके हाथ का इशारा देखते हुए ऊपर देखा, एक हवाई जहाज अपने पीछे बदलो की रेखा खींचे जा रहा था। उसके पापा मुस्कुराए और बोले ” ठीक है ।” बस उस दिन से ही उसके सपनों की उड़ान शुरू हो गई थी।
मोनिका एक छोटे से कस्बे में रहने वाली लड़की थी। एक मिडिल क्लास परिवार से थी। उसने तो कभी अपने शहर से बाहर अकेले पांव नहीं रखा था । ना जाने इतना बड़ा सपना कैसे बुन लिया। सच ही कहते है सब दिमाग की बात होती है । सोच लो तो कुछ भी संभव है ।
पर जैसे जैसे वो बड़ी होती गई उसका सपना धुंधला होता गया। या फिर उसने सपना तो देख लिया था पर कभी उम्मीद नई की थी कि पूरा होगा । पर शायद उसके पापा के दिमाग़ में घर कर गया था ।
परिस्थिति एसी बनी की मोनिका को बिना मन के इनजिनियरिंग में दाखिला लेना पड़ा। फिर एक दिन उसके पापा ने बोला तुम्हें उड़ना था ना, तैयार हो जाओ। उसके पापा के लिए वो पल कभी बदला ही नहीं।वह अब 22 साल की थी पर उसके पापा के दिमाग़ में वो अभी भी आठ साल की थी जिसकी इचछा पूरी करनी बाक़ी थी ।उसके पापा ने अपने दिमाग में उसका सपना हमेशा जीवीत रखा।

बस फिर क्या था, उसके मानो पंख लग गए हो। अपने जीवन में वह पहली बार अकेले कहीं जा रही थी और वह भी अपने देश से बाहर। कुछ घबराई कुछ उत्साहित वह अपने सपने को पूरा करने अकेले चल पड़ी। उस के बाद उसने कभी पीछे पलट के नहीं देखा। एक छोटे से कस्बे की मिडिल क्लास परिवार की लड़की ने अपने माता पिता के आशीर्वाद से बाहर साल की उम्र में देखा सपना बाईस साल की उम्र में पूरा कर लिया।

ਅਧਿਕਾਰ ਪੂਰਨ ਅੰਕੁਸ਼ ਮਾਂ

ਮੈਂ ਪੁੱਛਿਆ, ਆਸ਼ਾ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੇ ਬੱਚੇ ਦੀ ਦੇਖਭਾਲ ਕਰਾਂਗੀ, ਤੁਸੀਂ ਜਾਓ ਅਤੇ ਆਰਾਮ ਕਰੋ, ਤੁਸੀਂ ਰਸਮਾਂ ਵਿਚ ਰੁੱਝੇ ਹੋਏ ਹੋ ਅਤੇ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਵੀ ਫੜਿਆ ਹੈ. ਉਸਨੇ ਝਿਜਕਿਆ ਅਤੇ ਫਿਰ ਮੈਨੂੰ ਬੇਟਾ ਦੇਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ.
ਉਸ ਦੇ ਜਵਾਬ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਹੈਰਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਉਸ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਚੰਗੀ ਮਿੱਤਰ ਸੀ ਅਤੇ ਅਜਿਹੀ ਕਿਸੇ ਅਚਾਨਕ ਇਨਕਾਰ ਦੀ ਉਮੀਦ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਹੀ ਸੀ.
ਦਰਅਸਲ, ਆਸ਼ਾ ਨੇ ਇਕ ਮਹੀਨਾ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਬੇਟੇ ਨੂੰ ਜਨਮ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। . ਇੱਕ ਬੱਚੇ ਦੇ ਜਨਮ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਉਸਦੀ ਜਿੰਦਗੀ ਸਿਰਫ ਉਸਦੇ ਬੱਚੇ ਦੇ ਦੁਆਲੇ ਘੁੰਮਦੀ ਸੀ.
ਸ਼ੁਰੂ ਵਿਚ, ਮੈਂ ਉਸ ਦੇ ਵਿਵਹਾਰ ਨੂੰ ਸਧਾਰਣ ਤਬਦੀਲੀ ਵਜੋਂ ਕਲਪਨਾ ਕੀਤੀ, ਪਰ ਸਮੇਂ ਦੇ ਨਾਲ, ਮੈਂ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਉਹ ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਇਕ ਪਲ ਲਈ ਵੀ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਇੱਥੋਂ ਤਕ ਕਿ ਉਸ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਨਾਲ ਵੀ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ. ਉਸ ਤੋਂ ਇਸ ਵਤੀਰੇ ਦੀ ਕਲਪਨਾ ਕਰਨਾ ਆਮ ਗੱਲ ਸੀ, ਉਸਨੇ ਹੁਣ ਮੈਨੂੰ ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਇਕ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਅਤੇ ਅਧਿਕਰਪੁਰਨ ਅੰਕੁਸ਼ ਮਾਂ ਬਣ ਗਈ ਹੈ ਜੋ ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਦੀ ਦੇਖਭਾਲ ਲਈ ਆਪਣਾ ਆਰਾਮ, ਨੀਂਦ ਅਤੇ ਸਭ ਕੁਝ ਛੱਡਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹੈ.
ਪਰ ਕਿਤੇ, ਮੈਂ ਉਸ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਅਤੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਵਿਵਹਾਰ ਦਾ ਕਾਰਨ ਜਾਣਦੀ ਸੀ. ਇੱਕ ਬੱਚੇ ਦੇ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਉਸਨੇ ਆਪਣਾ ਸੁਤੰਤਰ ਜੀਵਨ, ਆਪਣਾ ਅਭਿਲਾਸ਼ਾਤਮਕ ਕੈਰੀਅਰ(ਉਹ ਇਕ ਬੜੀ ਅਰਲਾਈਨ ਵਿਚ ਪਾਇਲਟ ਸੀ) , ਰਹਿਣ ਲਈ ਆਪਣੀ ਮਨਪਸੰਦ ਜਗ੍ਹਾ, ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ, ਸਭ ਕੁਝ ‘ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪਾਲਣ ਲਈ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ ਸੀ, ਇਸ ਲਈ ਕੋਈ ਕਸਰ ਬਾਕੀ ਨਹੀਂ ਛੱਡ ਰਹੀ ਸੀ।ਹੁਣ ਤੱਕ, ਉਸ ਦੇ ਏਜੰਡੇ ਜਾਂ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਉਦੇਸ਼ ‘ਤੇ ਹੋਰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਸੀ.
ਉਹ ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਵਿਚ ਇੰਨੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਗਈ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਆਪਣੀ ਵੱਖਰੀ ਪਛਾਣ ਨੂੰ ਭੁੱਲ ਗਈ ਹੈ. ਉਹ ਹੁਣ ਸਿਰਫ ਇਕੋ ਇਕ ਉਮੀਦ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਦੀ ਮਾਂ ਹੈ.
ਇਹ ਤਬਦੀਲੀ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਸੋਚਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਉਹ ਕਿਸ ਹੱਦ ਤਕ ਅਤੇ ਕਿੰਨੀ ਦੇਰ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਚਲ ਸਕਦੀ ਹੈ? ਮੈਂ ਹੈਰਾਨ ਹਾਂ ਕਿ ਕੀ ਹੋਵੇਗਾ ਜਦੋਂ, ਜਦੋਂ ਉਸਦਾ ਬੱਚਾ ਵੱਡਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਹੀ ਚੀਜ਼ਾਂ ਕਰਨਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦੇਵੇਗਾ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਰੁੱਝ ਜਾਵੇਗਾ?
ਮੈਂ ਬੱਸ ਆਸ ਕਰਦੀ ਹਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਰਥਨਾ ਕਰਦੀ ਹਾਂ ਕਿ ਜਦੋਂ ਉਹ ਛੋਟਾ ਬੱਚਾ ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਅਸਮਾਨ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਆਪ ਉੱਡਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਉਹ ਉਸ ਦਿਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹੋਵੇ।